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March 24, 2026

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चिरंजीवी है भगवान परशुराम – स्वामी मुक्तिनाथानंद

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*चिरंजीवी है भगवान परशुराम – स्वामी मुक्तिनाथानंद*

 

*रविवार को अपने साप्ताहिक प्रवचन में स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने भगवान परशुराम के बारे विस्तृत रूप से चर्चा की*

 

*रामकृष्ण मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने रामकृष्णवचनामृत* पर अपने रविवारीय प्रवचन में बताया कि परशुराम हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। उनका जीवन पराक्रम, तपस्या, धर्म की रक्षा और अन्याय के विरोध का प्रतीक माना जाता है। उनका जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर हुआ था। परशुराम का जन्म त्रेता युग में हुआ माना जाता है। उनका नाम “परशुराम” इसलिए पड़ा क्योंकि वे हमेशा अपने हाथ में परशु (फरसा) नाम का दिव्य अस्त्र रखते थे।

 

स्वामी जी ने कहा कि परशुराम बचपन से ही अत्यंत तेजस्वी, पराक्रमी और तपस्वी थे। उन्होंने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया। भगवान शिव ने उन्हें युद्धकला, शस्त्र विद्या और दिव्य अस्त्र प्रदान किए। शिव से प्राप्त फरसा (परशु) के कारण ही वे “परशुराम” कहलाए। वे महान योद्धा होने के साथ-साथ एक ब्राह्मण ऋषि भी थे, इसलिए उन्हें ब्राह्मण और क्षत्रिय गुणों का संगम माना जाता है।

 

स्वामी जी ने बताया कि परशुराम के जीवन की सबसे प्रसिद्ध कथा सहस्त्रार्जुन नामक अत्याचारी राजा से जुड़ी है। सहस्त्रार्जुन ने एक बार महर्षि जमदग्नि के आश्रम में आकर उनकी कामधेनु गाय छीन ली और बाद में क्रोध में आकर महर्षि की हत्या कर दी। जब परशुराम को यह समाचार मिला तो वे अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने सहस्त्रार्जुन का वध कर दिया। इसके बाद उन्होंने पृथ्वी को अत्याचारी क्षत्रियों से मुक्त करने का संकल्प लिया। कहा जाता है कि उन्होंने 21 बार पृथ्वी से अधर्मी क्षत्रियों का नाश किया और धर्म की स्थापना की।

 

परशुराम का जीवन केवल युद्ध तक सीमित नहीं था। वे महान गुरु भी थे। उन्होंने कई प्रसिद्ध योद्धाओं को शस्त्र विद्या सिखाई। माना जाता है कि उन्होंने भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण को भी धनुर्विद्या का ज्ञान दिया। इस प्रकार वे महाभारत काल के महान गुरुओं में गिने जाते हैं।

 

एक और प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब भगवान राम ने सीता स्वयंवर में शिव का धनुष तोड़ा, तब परशुराम वहां आए और उन्होंने राम की परीक्षा ली। बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि राम भी विष्णु के ही अवतार हैं, तब उन्होंने राम को प्रणाम किया और शांत होकर तपस्या के लिए चले गए।

 

परशुराम को चिरंजीवी माना जाता है, अर्थात वे आज भी जीवित हैं और कलियुग के अंत तक पृथ्वी पर रहेंगे। कहा जाता है कि भविष्य में वे कल्कि को शस्त्र विद्या सिखाएंगे।

 

*स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने निष्कर्ष रूप में बताया कि* भारतीय संस्कृति में परशुराम को साहस, धर्म, गुरुता और न्याय का प्रतीक माना जाता है। उनका जन्मदिन परशुराम जयंती के रूप में मनाया जाता है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि अन्याय और अधर्म के विरुद्ध खड़ा होना ही सच्चा धर्म है।

 

*स्वामी मुक्तिनाथानंद*

अध्यक्ष

रामकृष्ण मठ लखनऊ

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