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August 5, 2026

Suraj Kesari

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लखनऊ में अलविदाई मजलिस और चुप ताज़िये के जुलूस के साथ मोहर्रम का समापन

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लखनऊ में अलविदाई मजलिस और चुप ताज़िये के जुलूस के साथ मोहर्रम का समापन

 

लखनऊ, सोमवार। (वरिष्ठ पत्रकार सैयद हबीब की लखनऊ से विशेष कवरेज)राजधानी लखनऊ का वातावरण सोमवार को ग़मगीन और रूहानी माहौल से सराबोर नज़र आया, जब मोहर्रम के समापन से पूर्व विभिन्न इमामबाड़ों और इलाक़ों में अलविदाई मजलिसों और मातमी जुलूसों का आयोजन किया गया। दो महीने आठ दिन तक चलने वाला यह मातमी सिलसिला अंततः चुप ताज़िये के ऐतिहासिक जुलूस के साथ पूरा हुआ। हर तरफ़ से आवाज़ें गूंज रही थीं – “जो चल बसे तो यह अपना सलाम-ए-आख़िर है” और “या हुसैन अलविदा”।

अंजुमन जिलाउल ईमान क़दीम की अलविदाई मजलिस

हर साल की परंपरा के अनुसार इस बार भी 7 रबीउल अव्वल को अंजुमन जिलाउल ईमान क़दीम की जानिब से मरहूमीन मिम्बरान और ओहदेदारान के ईसाले सवाब की मजलिस का आयोजन किया गया। यह मजलिस मस्जिद-ए-इमाम-ए-ज़माना (अ.ज.), दरगाह वज़ीर बाग रोड, रुस्तम नगर में संपन्न हुई।

मजलिस का आग़ाज़ तिलावत-ए-कुरआन से हुआ और उसके बाद नौहा व मातम का सिलसिला चलता रहा। इस अवसर पर इमामे जुमा मौलाना सैयद कल्बे जव्वाद नक़वी क़िब्ला ने खिताब किया। उन्होंने अपने बयान में कहा कि शहीद-ए-कर्बला हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) का पैग़ाम हर दौर में इंसाफ़, सब्र और इंसानियत की राह दिखाता है। मौलाना ने मरहूमीन के लिए भी दुआ-ए-मग़फ़िरत की और कहा कि ऐसे आयोजन हमें अपने बड़ों की याद दिलाते हैं और उनके नेक कामों से सीखने का मौक़ा देते हैं।

मजलिस में बड़ी तादाद में मोमेनीन मौजूद रहे। स्थानीय समाजसेवी हाजी अब्दुल मजीद, सैयद शब्बीर हुसैन, अंसार रिज़वी और अन्य लोगों ने मजलिस की व्यवस्था में अहम भूमिका निभाई। खास बात यह रही कि इस बार यह मजलिस रीज़वी इलेक्ट्रॉनिक्स की ओर से आयोजित कराई गई, जिससे अनुशासन और सुविधा का खास ध्यान रखा गया।

चुप ताज़िये का ऐतिहासिक जुलूस

इसी दिन राजधानी के चौक इलाके से चुप ताज़िये का ऐतिहासिक जुलूस बरामद हुआ। सुबह की नमाज़ के बाद इमामबाड़ा नाज़िम साहब से शुरू हुए इस जुलूस में हज़ारों अज़ादारों ने शिरकत की। इस मौक़े पर ग़म और खामोशी का आलम था।

ढोल-नगाड़ों की जगह सन्नाटा, मातमी धुनें और अश्कों का सैलाब देखने को मिला। हर अज़ादार के लबों पर “या हुसैन अलविदा” का नारा था और आंखें शहीद-ए-कर्बला की याद में अश्कबार नज़र आ रही थीं। मातमी अंजुमनों ने सीना ज़नी और नौहाख़्वानी करते हुए जुलूस को और भी रूहानी बना दिया।

जुलूस का रास्ता चौक, नक्खास और हुसैनाबाद के विभिन्न इलाक़ों से होता हुआ रौज़ा-ए-काज़मैन जाकर समाप्त होगा। पूरे रास्ते में शहर की गलियां अज़ादारों से भरी हुई थीं। स्थानीय लोग अपने-अपने घरों से सबीलें लगाकर पानी और शर्बत तकसीम करते नज़र आए।

मजलिस-ए-अख़्तिताम और मौलाना एजाज़ अतहर का बयान

इस मौके पर आयोजित मजलिस को मौलाना एजाज़ अतहर ने खिताब किया। उन्होंने अपने बयान में कहा कि कर्बला का वाक़िया इंसाफ़ और सच्चाई की जीत का प्रतीक है। मौलाना ने कहा, “आज भी अगर हम अपने समाज को बुराइयों से बचाना चाहते हैं तो हमें हुसैनी उसूलों पर अमल करना होगा। इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने खून से इंसानियत को नया जीवन दिया और यही वजह है कि हर साल दुनिया भर में मोहर्रम की याद इतनी शिद्दत से मनाई जाती है।”

उन्होंने आगे कहा कि चुप ताज़िये का जुलूस दरअसल ग़म का वह आख़िरी पैग़ाम है जो मोहर्रम और सफ़र के मातमी दिनों के समापन को दर्शाता है।

शहर का माहौल

जुलूस और मजलिस के दौरान राजधानी का माहौल ग़मगीन लेकिन अनुशासित रहा। पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए थे। जगह-जगह बैरिकेडिंग और ट्रैफिक डायवर्जन की व्यवस्था की गई थी, ताकि जुलूस शांतिपूर्ण तरीक़े से निकल सके।

स्थानीय निवासी मुर्तुज़ा अली ने कहा, “हर साल हम इस जुलूस में शामिल होकर अपने दिल की तसल्ली पाते हैं। यह सिर्फ़ ग़म का इज़हार नहीं बल्कि इंसाफ़ और सच्चाई के लिए खड़े होने का जज़्बा भी देता है।” वहीं ज़ैनब फातिमा, जो अपने परिवार के साथ मजलिस में शामिल हुईं, ने कहा कि “यह माहौल इंसानियत और भाईचारे का पैग़ाम देता है। हर साल की तरह इस बार भी लोगों ने एक-दूसरे की मदद कर साबित किया कि कर्बला की सीख आज भी ज़िंदा है।”

दो महीने आठ दिन का सफ़र

मोहर्रम की शुरुआत से लेकर चुप ताज़िये तक का सफ़र दो महीने आठ दिन लंबा रहा। इस दौरान राजधानी के छोटे-बड़े इमामबाड़ों और अंजुमनों ने मजलिस, मातम और जुलूसों का आयोजन किया।

हर गली, हर सड़क से उठने वाली नौहा-ख़्वानी और मातमी सदा ने शहर को कर्बला की याद से जोड़ दिया। इमामबाड़ा ग़ुफ़रानमाब, छोटा इमामबाड़ा, बड़ा इमामबाड़ा और नक्खास के इमामबाड़े इन दिनों अज़ादारों से सराबोर हुए

समापन की दुआ

आख़िरकार सोमवार को चुप ताज़िये के जुलूस के साथ इस मातमी सफ़र का समापन हुआ। ग़मगीन माहौल में अज़ादारों ने हाथ उठाकर दुआ मांगी कि इंसानियत हमेशा इमाम हुसैन (अ.स.) की सीखों से रोशन रहे और समाज में अमन, भाईचारा और इंसाफ़ कायम रहे।

इस तरह राजधानी लखनऊ ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि कर्बला का पैग़ाम सिर्फ़ किसी एक मज़हब का नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत का है।

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