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June 22, 2026

Suraj Kesari

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सरकार के प्रति मीडिया का बदल रहा है रुख

1 min read

सरकार के प्रति मीडिया का बदल रहा है रुख,,,,,,,,,,,,,,पिछले कुछ समय में आपने एक चीज गौर की होगी कि मीडिया का रुख सरकार के प्रति अब बदला बदला सा लग रहा है। जो मीडिया सरकार की गोद में बैठकर प्रोपेगेंडा चलाती थी, अब वो सरकार से सवाल पूछने लगी है। ऐसा क्यों हुआ, मैने जितना समझा है उतना बता रहा हूं। पहले तो आप ये जानिये कि मीडिया और टीआरपी का जो नाता पहले था, वो अब भी और वो शायद लंबे समय तक रहेगा. पीआर की दुनिया में एक शब्द होता है अवसरवाद. जब जनता की भावना बदलती है, तब मजबूत मीडिया ब्रांड्स भी वास्तविकता से बहस नही करते, वे गति के साथ खुद को संरेखित करते है या कह सकते है कि एक अवसर खोजते है. किसी की कोई विचारधारा नहीं बदली है, बस बाजार बदला है. एक बात आप समझ लीजिये कि जब कोई सरकार लंबे समय तक सत्ता में रहती है, तो शुरू में मीडिया पर उसका प्रभाव ज़्यादा होता है।

लेकिन समय के साथ नीतियों के नकारात्मक परिणाम दिखने लगते हैं. महंगाई, बेरोज़गारी, किसान, युवा जैसे मुद्दे दबाए नहीं जा पाते. सरकार का नैरेटिव कंट्रोल कमजोर होने लगता है

तब मीडिया को भी समझ आने लगता है कि अब सिर्फ “सरकारी लाइन” चलाना सुरक्षित नहीं है। एक सबसे बड़ी वजह डिजीटल क्रांती भी हैं. जब से YouTube, X (Twitter), Instagram पर स्वतंत्र पत्रकार, फैक्ट चेकर्स, ग्राउंड रिपोर्टर्स सरकारी दावों की तुरंत पोल खोल देते हैं। अगर मेनस्ट्रीम मीडिया चुप रहती है, तो उसकी विश्वसनीयता पूरी तरह खत्म हो जाती है।

 

काफी समय तक भारतीय मीडिया पर यह आरोप लगता रहा कि वह सत्ता के सामने नतमस्तक है। सवाल पूछने की जगह सफ़ाई देती है, जवाब मांगने की जगह उपलब्धियाँ गिनाती है। “गोदी मीडिया” जैसे शब्द इसी दौर की उपज थे। लेकिन हाल के महीनों में एक अजीब-सा दृश्य दिखा है—वही मीडिया, जिस पर सत्ता की ढाल बनने के आरोप थे, अब सरकार से सवाल पूछती नज़र आ रही है।

प्रश्न यह नहीं है कि सवाल पूछे जा रहे हैं या नहीं। असली प्रश्न यह है कि यह बदलाव क्यों आया?

सच यह है कि मीडिया का यह नया तेवर किसी अचानक हुए नैतिक जागरण का परिणाम नहीं लगता। अगर ऐसा होता, तो बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की पीड़ा, कोविड अव्यवस्था या मणिपुर जैसे मुद्दों पर सवाल बहुत पहले उठाए गए होते। उस समय चुप्पी थी, क्योंकि सत्ता मज़बूत थी और सवाल पूछने की कीमत ज़्यादा थी।

आज परिस्थितियाँ बदली हैं। चुनावी अनिश्चितता है, जनता में असंतोष है, और सोशल मीडिया ने वैकल्पिक मंच तैयार कर दिए हैं। अब अगर मुख्यधारा मीडिया सवाल नहीं पूछती, तो उसकी विश्वसनीयता पूरी तरह समाप्त होने का खतरा है। ऐसे में सवाल पूछना अब नैतिक साहस नहीं, बल्कि व्यावसायिक और रणनीतिक मजबूरी बन गया है।

यह अवसरवाद है—इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन लोकतंत्र का एक दिलचस्प सच यह भी है कि कभी-कभी अवसरवाद भी जनता के हित में काम कर जाता है। जब मीडिया सत्ता से सवाल करती है, चाहे कारण जो भी हो, तो जवाबदेही का दबाव बनता है। और लोकतंत्र में दबाव ही सुधार की पहली सीढ़ी होता है।

फिर भी हमें भ्रम में नहीं रहना चाहिए। मीडिया का यह बदला हुआ रुख स्थायी है या अस्थायी—यह अभी स्पष्ट नहीं है। असली परीक्षा तब होगी जब सत्ता बदल जाए, या सत्ता फिर से मज़बूत हो जाए। तब देखना होगा कि क्या सवालों की यह परंपरा जारी रहती है, या फिर एक नई “गोद” तलाश ली जाती है।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी भूमिका जनता की है। मीडिया वही दिखाती है, जो देखा जाता है। अगर दर्शक सवालों वाली पत्रकारिता को समर्थन देंगे, तो मीडिया को मजबूरन वही करना पड़ेगा। लेकिन अगर शोर, नफ़रत और एजेंडा ज़्यादा बिकेगा, तो वही परोसा जाएगा।

अंततः सवाल पूछना मीडिया का उपकार नहीं, उसका कर्तव्य है।

और जब मीडिया अपने कर्तव्य की ओर लौटती दिखे—

तो कारण चाहे अवसरवाद हो या आत्मबोध—

लोकतंत्र को उसका लाभ ज़रूर मिलना चाहिए।

सौरभ ‘शुभ’

सिवान, बिहार

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