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May 8, 2026

Suraj Kesari

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यूजीसी के नए ‘इक्विटी रूल्स’ भेदभाव रोकने की कोशिश या


यूजीसी के नए ‘इक्विटी रूल्स’ भेदभाव रोकने की कोशिश या सवर्ण समाज के खिलाफ ‘साजिश’? – अभिषेक गोयल

 

खतौली – अखिल भारतीय वैश्य महासंगठन खतौली के नगर अध्यक्ष अभिषेक गोयल ने रविवार को एक प्रेस बयान जारी कर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशंस 2026 के नए नियमों को भेदभावपूर्ण बताया है। उनका तर्क है कि यह कानून सामान्य वर्ग के छात्रों के बीच असुरक्षा और उत्पीड़न का कारण बन सकता है।

अभिषेक गोयल ने नई शिक्षा नीतियों के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों के भविष्य को लेकर चिंताएं जताई हैं।

उनका कहना है कि यह नया कानून सामाजिक समरसता के बजाय द्वेष बढ़ा सकता है और सामान्य वर्ग के छात्रों में असुरक्षा, मानसिक उत्पीड़न और भविष्य को लेकर खतरा पैदा कर सकता है।

अभिषेक गोयल ने कहा कि नए एक्ट के नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव कर सकते हैं इस कानून के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ झूठी शिकायतें बढ़ सकती है यह अधिनियम 15 जनवरी से देश भर के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में लागू किया गया है,

समानता के नाम पर लाया गया यह कानून अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के प्रति अत्यधिक उदार दिखाई पड़ता हैं। इससे शैक्षणिक संस्थानों में सामाजिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून के तहत एक विशेष वर्ग को कानूनी अधिकार दिए गए हैं जिनका दुरुपयोग सामान्य वर्गों के छात्रों को आपराधिक मामलों में अनावश्यक रूप से फंसाने के लिए किया जा सकता है। नए नियमों के तहत जातिगत भेदभाव की परिभाषा केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों के साथ होने वाले व्यवहार तक ही सीमित रखी गई है। इसका अर्थ यह लगाया जा सकता है कि यदि किसी सामान्य वर्ग के छात्र के साथ उसकी जाति के कारण भेदभाव होता है, तो वह इन नियमों के तहत शिकायत नहीं कर पाएगा। ड्राफ्ट में झूठी शिकायतों के लिए जुर्माने का प्रावधान था, लेकिन अंतिम नियमों में इसे हटा दिया गया है। छात्रों को डर है कि इस सुरक्षा कवच के बिना इन नियमों का दुरुपयोग निजी रंजिश निकालने के लिए किया जा सकता है।

अभिषेक गोयल ने कहां कि प्रतिस्पर्धा के इस युग में, ऐसे प्रावधान छात्रों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में बाधा डाल सकते हैं।यदि केवल आरोप के आधार पर एफआईआर दर्ज की जाती है तो मेधावी छात्रों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।

उन्होंने जांच समितियों की संरचना पर भी सवाल उठाते हुए कहां कि यदि जांच समितियों के सभी सदस्य एक ही वर्ग से संबंधित हैं, तो जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा होता है। इससे मानसिक उत्पीड़न, शिक्षा से वंचित होना और सामाजिक द्वेष का प्रसार जैसे प्रतिकूल परिणाम हो सकते हैं। इससे बच्चों में हीन भावना पैदा होगी और समाज में असंतोष बढ़ेगा।

अभिषेक गोयल ने केंद्र सरकार से यूजीसी द्वारा लाए गए इस अधिनियम को वापस लेने या संशोधित करने का अनुरोध किया है, ताकि शिक्षा के क्षेत्र में समानता और न्याय कायम रहे।तथा सामाजिक सद्भाव बरकरार रहे और छात्र शांतिपूर्ण वातावरण में शिक्षा प्राप्त कर सकें और प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग ले सकें।

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