सिर्फ कानून नहीं, सोच भी बदले: महिला सम्मान की असली चुनौती महिला केवल परिवार की धुरी नहीं है
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सिर्फ कानून नहीं, सोच भी बदले: महिला सम्मान की असली चुनौती महिला केवल परिवार की धुरी नहीं है, वह समाज के निर्माण की पहली पाठशाला है। एक महिला शिक्षित होती है तो केवल उसका जीवन नहीं बदलता, उसके साथ एक पूरा परिवार बदलता है। परिवार बदलता है तो समाज बदलता है और समाज बदलता है तो देश और दुनिया के भविष्य की दिशा बदल सकती है।फिर भी एक सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है: जिस महिला को हम शक्ति कहते हैं, दुर्गा कहते हैं, धरती मां कहते हैं, उसे अपने सम्मान, स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए बार-बार संघर्ष क्यों करना पड़ता है?हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों और विभिन्न युगों की कथाओं में महिलाओं के सम्मान और न्याय को लेकर अनेक प्रसंग मिलते हैं। युग बदले, समाज बदला, व्यवस्थाएं बदलीं, लेकिन महिलाओं के सामने चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुईं। यह केवल भारत की समस्या नहीं है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आज भी महिलाओं और लड़कियों के साथ भेदभाव, हिंसा और शोषण के मामले सामने आते हैं। परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, लेकिन चुनौती वैश्विक है।
महिला के भीतर एक अद्भुत सहनशीलता होती है। वह परिवार को संभालती है, रिश्तों को जोड़ती है, कठिन परिस्थितियों को अपने भीतर समेट लेती है और कई बार दूसरों की गलतियों को भी माफ कर आगे बढ़ जाती है। शायद इसी कारण उसे शक्ति का स्वरूप कहा गया।लेकिन अब समय आ गया है कि महिला की सहनशीलता को उसकी कमजोरी न समझा जाए।माफ करना उसकी महानता हो सकती है, लेकिन अन्याय सहते रहना उसकी मजबूरी नहीं होना चाहिए।आज महिलाओं की स्वतंत्रता, सम्मान और समानता को लेकर देश में जो चर्चा हो रही है, उसमें पुणे में राहुल गांधी द्वारा महिलाओं के अधिकारों और स्वतंत्रता को लेकर कही गई बातों ने भी एक नई बहस को जन्म दिया है। राजनीतिक विचारधाराओं से अलग हटकर देखें तो महिला के सम्मान और सुरक्षा का प्रश्न किसी एक नेता या राजनीतिक दल का विषय नहीं हो सकता। यह पूरे समाज का प्रश्न है और इसका उत्तर भी हमें मिलकर तलाशना होगा।सबसे पहले हमें अपने घर से शुरुआत करनी होगी।बेटा और बेटी हमारे लिए बराबर होने चाहिए।बेटे को अधिक स्वतंत्रता और बेटी को अधिक प्रतिबंध, बेटे को परिवार का वारिस और बेटी को केवल जिम्मेदारी मानने की मानसिकता अब बदलनी होगी। दोनों को समान शिक्षा, समान अवसर, समान सम्मान और अपने जीवन के निर्णय लेने का समान अधिकार मिलना चाहिए।और यह बदलाव केवल पुरुषों से अपेक्षित नहीं है।महिला को भी महिला का सम्मान करना सीखना होगा।एक महिला दूसरी महिला के संघर्ष को समझे, उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करे, उसके निर्णयों का सम्मान करे और उसे आगे बढ़ने में सहयोग दे। जब महिलाएं एक-दूसरे का हाथ थामेंगी, तभी महिला सशक्तिकरण का अर्थ और मजबूत होगा।हमें अपनी बेटियों की सफलता की परिभाषा भी बदलनी होगी।बेटी को केवल यह सिखाना पर्याप्त नहीं कि वह एक अच्छी बेटी, अच्छी पत्नी या अच्छी बहू बने। उसे यह भी सिखाना होगा कि वह एक शिक्षित, सफल, आत्मनिर्भर, धैर्यशाली और निर्णय लेने में सक्षम महिला बने।विवाह और परिवार जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं, लेकिन किसी महिला की पूरी पहचान केवल उसके रिश्तों से नहीं होनी चाहिए। उसके अपने सपने, प्रतिभा, शिक्षा, विचार, करियर और उपलब्धियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।बेटियों को बचपन से यह विश्वास देना होगा कि उनका जीवन केवल दूसरों के लिए त्याग करने के लिए नहीं है। वे सपने देख सकती हैं, अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं, अपने निर्णय ले सकती हैं और परिवार के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।क्योंकि एक शिक्षित महिला केवल स्वयं शिक्षित नहीं होती।एक महिला शिक्षित होती है तो पूरा परिवार शिक्षित होता है।
पूरा परिवार शिक्षित होता है तो समाज शिक्षित होता है।शिक्षित समाज राष्ट्र को आगे बढ़ाता है।
और शिक्षित समाजों से एक बेहतर दुनिया का निर्माण होता है।इसलिए बेटियों की शिक्षा को केवल व्यक्तिगत विकास नहीं, बल्कि सामाजिक विकास की बुनियाद मानना होगा।इस बदलाव में माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। बेटे को यह सिखाना जरूरी है कि किसी लड़की की इच्छा, स्वतंत्रता और सीमाओं का सम्मान किया जाए। उसी तरह बेटी को यह सिखाना जरूरी है कि वह अपने अधिकारों को पहचाने, अपनी आवाज उठाए और अपने निर्णयों पर विश्वास करना सीखे।स्कूल और शिक्षक भी इस बदलाव के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। शिक्षा केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने का माध्यम नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य संवेदनशील, जिम्मेदार और समानता में विश्वास रखने वाले नागरिक तैयार करना भी है।लेकिन सामाजिक सोच में बदलाव के साथ सख्त और प्रभावी कानून भी उतने ही जरूरी हैं।महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के लिए कानून स्पष्ट और मजबूत होने चाहिए। अपराध की स्थिति में शिकायत से लेकर जांच और न्याय तक की प्रक्रिया भरोसेमंद होनी चाहिए। दोषी के खिलाफ निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि कानून केवल किताबों में मौजूद व्यवस्था न रहे, बल्कि आम महिला के लिए वास्तविक सुरक्षा का आधार बने।कानून अपराध के बाद न्याय दे सकता है, लेकिन शिक्षा और संस्कार अपराध होने से पहले मानसिकता बदल सकते हैं।
इसलिए हमें दोनों रास्तों पर एक साथ चलना होगा: सख्त कानून और संवेदनशील समाज।
जिस महिला को हम देवी के रूप में पूजते हैं, उसे वास्तविक जीवन में भी सम्मान देना होगा।
दुर्गा की पूजा केवल मंदिर में नहीं, बल्कि उस सोच में होनी चाहिए जहां किसी बेटी को अपने सम्मान के लिए बार-बार संघर्ष न करना पड़े।
धरती मां का सम्मान केवल शब्दों में नहीं, बल्कि ऐसे समाज के निर्माण में होना चाहिए जहां महिला को केवल सहने के लिए नहीं, बल्कि सम्मान, स्वतंत्रता और आत्मविश्वास के साथ जीने का अवसर मिले।
और इस परिवर्तन की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। यह जिम्मेदारी माता-पिता की है, शिक्षकों की है, समाज की है, पुरुषों की है और महिलाओं की भी है।
जब मां बेटे और बेटी में अंतर नहीं करेगी, जब महिला महिला का सम्मान करेगी, जब पिता बेटी के सपनों को बेटे के सपनों जितना महत्व देगा, जब स्कूल बच्चों को केवल विषय नहीं बल्कि जीवन-मूल्य भी सिखाएंगे और जब सरकार कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करेगी, तभी वास्तविक बदलाव दिखाई देगा।
हमारी बेटियों को केवल अच्छी बेटी, अच्छी पत्नी या अच्छी बहू बनने की शिक्षा नहीं चाहिए। उन्हें एक अच्छी इंसान, शिक्षित नागरिक, सफल महिला, आत्मनिर्भर व्यक्तित्व और अपने निर्णय स्वयं लेने वाली मजबूत महिला बनने की शिक्षा चाहिए।
क्योंकि जब एक महिला आगे बढ़ती है तो वह अकेली आगे नहीं बढ़ती। उसके साथ एक परिवार आगे बढ़ता है। फिर वही परिवार समाज को आगे ले जाता है।
महिला को सशक्त करना केवल महिला के भविष्य को बदलना नहीं है, यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बदलना है।यही वास्तविक महिला सम्मान है।
यही वास्तविक समानता है।
और यही वह बदलाव है जिसकी शुरुआत हमें अपने घर से करनी होगी। _लेखिका डॉ. हिमा बिन्दु नायक खतरावथ, मान्यता प्राप्त राज्य मुख्यालय स्वतंत्र पत्रकार लखनऊ
